Tuesday, July 13, 2010

महिलाओं की स्वतंत्रता में भी दबिश बहू तो कमाऊ चाहिए मगर... शर्तें लागू हैं!

दुनिया बदल रही है... लोग तकनीक के घोड़े पर सवार चाँद पर घर बनाने जा पहुँचे और हमने एक देश से दूसरे देश में मित्र बनाने के लिए इंटरनेट जैसे आधुनिक साधन इजाद कर लिए, लेकिन जब बात विवाह जैसी रस्म पर पहुँचती है तो न जाने क्यों हम भारतीयों के सिद्धांत, आधुनिकता और तमाम विकसित होने के दावे खोखले हो जाते हैं।
पराए घर से अनजान परिवेश में कदम रख रही लड़की के लिए आत्मनिर्भर और विकसित मानसिकता की होने के बावजूद आज भी कई बेड़ियाँ मौजूद हैं जो मन से उसे नए रिश्तों को अपनाने नहीं देती और फिर जिंदगीभर के लिए एक गाँठ उसके मन में पड़ जाती है।
छब्बीस वर्षीय रोशनी सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। वह अपने माता-पिता की तीन संतानों में सबसे बड़ी है। उसकी छोटी बहन और छोटा भाई अभी कॉलेज की पढ़ाई कर रहे हैं। रोशनी उत्साह से भरी, जिंदादिल और खुशियाँ बाँटने वाली आज की नवयुवती है।
वह समाज की बदलती सकारात्मक विचारधारा का एक सशक्त उदाहरण है, जहाँ लड़कियों के लिए उनके परिजनों ने खुला आकाश उपलब्ध करवाया है और उन्हें एक स्वस्थ माहौल में बिना किसी पक्षपात के पाला है। इसलिए जब मंगेश का रिश्ता आया तो रोशनी के साथ बाकी परिजन भी प्रसन्न थे।
कारण, मंगेश पढ़ा-लिखा, सुलझा, आधुनिक विचारों वाला लड़का था और एक अच्छी कंपनी में शानदार पद पर कार्यरत भी। उसके पिता बैंककर्मी थे और माँ स्कूल शिक्षिका। रोशनी के परिजनों को यह परिवार सुलझा तथा समझदार लगा। रोशनी को लगा कि उसने अपने माता-पिता के लिए जो सपने देखे हैं, वे अब भी निर्बाध पूरे हो पाएँगे लेकिन शायद यह इतना सहज नहीं था।
शादी के बाद हिल स्टेशन पर घूमते हुए रोशनी ने पहले ही दिन ढेर सारी शॉपिंग कर डाली। उसने पहले से ही इसके लिए पैसे बचाकर रखे थे। वह अपने मायके के अलावा ससुराल में भी सबके लिए कुछ न कुछ खरीदना चाहती थी। उसके मन में इसे लेकर उत्साह था। वह चाहती थी कि नए घर में भी वह पुराने घर की ही तरह सबसे व्यवहार करे।
इसी भावना के साथ जब लौटकर उसने सारे उपहार अपने सास-ससुर को दिखाए तो खुशी से हुलसती रोशनी पर सास के एक ही वाक्य ने पानी फेर दिया-'अरे.. अब अपने मम्मी-पापा के लिए इतना सब लाने की क्या जरूरत थी। अब तुम उनके लिए पराई हो गई हो...वैसे भी बेटी का दिया थोड़े ही न लेते हैं माँ-बाप..' इतना कहकर वे व्यंग्य भरी हँसी हँस दीं और ससुर भी उनके साथ हँसने लगे।
रोशनी हतप्रभ थी। उसने तो सोचा था कि वह यहाँ भी बेटी बनकर दोनों घरों के लिए समान व्यवहार करेगी लेकिन...! उसके बाद से आज तक रोशनी अपने माता-पिता के लिए गिफ्ट लाती है, लेकिन बिना अपने सास-ससुर को बताए। उसके मन में सास-ससुर के लिए माता-पिता वाला भाव आ ही नहीं पाया।
टीना के सास-ससुर तो इससे भी एक कदम आगे निकले। उन्होंने विवाह के अगले ही दिन टीना को बैठाकर उसके बचत खातों, पॉलिसीज़ आदि की जानकारी ले ली। टीना एक कॉलेज में पीआर एक्जीक्यूटिव थी और उसने अपने छोटे भाई की पढ़ाई का खर्चा अपने ऊपर ले रखा था। साथ ही मायके में बने नए घर के इंटीरियर का खर्चा भी वह जिद करके वहन कर रही थी।
उसके माता-पिता ने कहा भी कि वह इस खर्चे को रहने दे...वरना उसके ससुराल वाले क्या सोचेंगे। लेकिन टीना ने कहा कि अब जमाना बदल गया है और वे लोग पढ़े-लिखे लोग हैं। ऐसी छोटी बात नहीं करेंगे। बहरहाल, टीना की यह गलतफहमी जल्द ही दूर हो गई।
उसके बचत खातों तथा खर्चे के बारे में जानने के बाद उसके सास-ससुर ने एक स्वर में कह दिया कि उसे अपने भाई-बहन पर होने वाले खर्चों पर रोक लगानी होगी, क्योंकि अब वे उसकी जिम्मेदारी नहीं है। अब उसके पैसों पर उनका हक नहीं रहा। टीना उनकी बात सुनकर आश्चर्य में पड़ गई, क्योंकि वह तो यह समझ रही थी कि स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता ने उसके इर्द-गिर्द बुने दायरों से उसे निजात दिला दी है, लेकिन असलियत में तो दायरा वहीं का वहीं था, बस रस्सी थोड़ी लंबी कर दी गई थी।
रोशनी और टीना की कहानी महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके लिए बदलती समाज की विचारधारा के बीच एक नया स्पीडब्रेकर खड़ा कर देती है। जहाँ माता-पिता के घर में तो वे वैचारिक स्वतंत्रता, स्वनिर्णय तथा आत्मसम्मान जैसे गुण खुद में विकसित करती हैं, लेकिन ससुराल जाते ही उन्हें जिंदगी से जुड़ी हर परिभाषा बनावटी लगने लगती है।
बेहद स्वस्थ माहौल में, करियर को ऊँचाइयों पर ले जाती लड़की को तब झटका लगता है जब आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते हुए भी उसे अर्थ से जुड़े मामले में ससुराल वालों का हर निर्णय मानने पर मजबूर होना पड़ता है। यह नए जमाने में दहेज प्रताड़ना का बदला हुआ तथा और भी विकृत रूप है। पढ़ी-लिखी कमाऊ लड़की के पक्ष में समाज में सकारात्मक माहौल बनने लगा है।
लोग कामकाजी लड़की को सहर्ष बहू बना रहे हैं और उसे काम जारी रखने से भी नहीं रोक रहे, लेकिन इसके पीछे कहीं एक ऐसी मानसिकता उभरकर सामने आ रही है जो लड़कियों को हैरत में डाल रही है। असल में कुछ स्वार्थी लोग अब कमाऊ बहू को दहेज के 'ईएमआई' (इक्वेटेड मंथली इंस्टॉलमेंट) के रूप में भी देखने लगे हैं।
वे चाहते हैं कि बहू तो कमाऊ आए, लेकिन उसके पैसों पर उनका अधिकार हो। यहाँ तक कि वे उससे यही अपेक्षा रखते हैं कि वह अपनी तनख्वाह हर महीने उनके (ससुराल वालों के) हाथ में रखे और अपने खर्चों को भी ससुराल वालों से पूछकर ही करे। साथ ही मायके वालों पर पैसा न खर्च करे।
पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होती युवतियों की तादाद बढ़ रही है। वे हर उस क्षेत्र में अपनी दक्षता साबित कर रही हैं जहाँ पहले पुरुषों का वर्चस्व हुआ करता था। आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ने से उनके इरादों में और भी विश्वास पैदा हुआ है, लेकिन जब ऐसी घटनाएँ सुनने को मिलती हैं तो लगता है कि समाज लड़कियों के लिए कहाँ बदला? वह तो अब भी उन्हें अधिकार जताने की वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझता।
पहले जब घर की आमदनी का स्रोत केवल पुरुषों के पास हुआ करता था, तब भी महिलाओं को खर्च करने के लिए उनकी अनुमति लेनी पड़ती थी और हर एक पैसा खर्च करने पर हिसाब देना पड़ता था। आज जब महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं तब भी हालात वही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब ससुराल वाले उनकी आमदनी पर अधिकार जताने का प्रयास करने लगे हैं।
यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है कि पढ़ी-लिखी आर्थिक रूप से सक्षम लड़कियाँ भी ऐसे समय में अधिकांशतः माता-पिता की इज्जत तथा अन्य कई बेड़ियों के कारण चुपचाप ऐसे अतिक्रमण बर्दाश्त कर लेती हैं। यह आश्चर्यजनक है, लेकिन सच है। या फिर जब पानी सर से ऊपर हो जाता है तो फिर बात रिश्तों के टूटने तक आ जाती है।
मुद्दा यह कि लड़कियाँ आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद वैचारिक संकीर्णता के कारण टूट जाती हैं और यह संकीर्णता या स्वार्थी सोच उसे अपने मायके से जुड़ने की इजाजत भी नहीं देती और नए घर के लिए भी उसके मन में कड़वाहट घोल देती है। लड़कियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता तब ही सार्थक होगी जब इस तरह की बेड़ियाँ उसके पैरों से कट जाएँगी !......

27 comments:

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  2. asd bhaai aadab aapne dil ki ghraayiyon se is sch ko tlaaashaa he or aaj esh men yhi flsfaa tezi se chl rhaa he isi liye paarivaarik jivnon men sflataaon ke sath asfltaayen or draaren tezi se aarhi hen. meraa hindi blog akhtarkhanakela.blogpot.com he prtikshaart rhenge.

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  3. acha lekh likha hai aapne,lekin yeh ek hi naam se itne comment kyo kar rakhe hai?

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  4. महिलाओ से जुड़ा एक अच्छा मुद्दा उठाया आपने असल में समस्या ये है कि आज भी समाज में महिलाओ को किसी भी विषय में निरणय लेने का अधिकार नहीं दिया गया है अपने पैसे अपने मायके वालो पर अपनी इच्छा से खर्चा करना तो दूर विवाहित लड़कियों को किसी सुख दुख में अपने मायके जाने के लिए भी पति से ले कर पुरे ससुराल वालो से इजाजत लेनी होती है यदि उन्होंने हा कहा तो ठीक ना कहा तो वो अपने ही घर वालो से मिल भी नहीं सकती |

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  5. एक अच्छे कवि से मिलकर अच्छा लगा.

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  6. मैंने आपके लेख के विचारों को काव्यात्मक कहा है. अन्यथा न लें.

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  7. Ye sab waaqyaat bilkul sachhe lagte hain..bahut achha likha hai..!

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